पृथ्वीराज चौहान
पृथ्वीराज चौहान
पृथ्वीराज चौहान सन् 1178-1192 चौहान वंश के हिंदू क्षत्रिय राजा थे, जो उत्तर भारत में १२ वीं सदी के उत्तरार्ध में अजमेर और दिल्ली पर राज्य करते थे। वे भारतेश्वर, पृथ्वीराजतृतीय, हिन्दूसम्राट्, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा इत्यादि नाम से प्रसिद्ध हैं। भारत के अन्तिम हिन्दूराजा के रूप में प्रसिद्ध पृथ्वीराज 1235 में पंद्रह वर्ष की आयु में राज्य सिंहासन पर आरूढ हुए। पृथ्वीराज की तेरह रानीयाँ थी। उन में से संयोगिता प्रसिद्धतम मानी जाती है। पृथ्वीराज ने दिग्विजय अभियान में 1177 वर्ष में भादानक देशीय को, 1182 वर्ष में जेजाकभुक्ति शासक को और 1183 वर्ष में चालुक्य वंशीय शासक को पराजित किया। इन्हीं वर्षों में भारत के उत्तरभाग में ग़ोरी नामक गोमांस भक्षण करने वाला योद्धा अपने शासन और धर्म के विस्तार की कामना से अनेक जनपदों को छल से या बल से पराजित कर रहा था। उसकी शासन विस्तार की और धर्म विस्तार की नीत के फलस्वरूप 1175 वर्ष से पृथ्वीराज का घोरी के साथ संघर्ष आरम्भ हुआ।
उसके पश्चात् अनेक लघु और मध्यम युद्ध पृथ्वीराज के और घोरी के मध्य हुए। सभी युद्धों में पृथ्वीराज ने गौरी को बन्दी बनाया और उसको छोड़ दिया। परन्तु अन्तिम बार नरायन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को रात के अंधेरे में छल कपट से बंदी बना लिया , पश्चात् गौरी ने पृथ्वीराज को कुछ दिनों तक 'इस्लाम्'-धर्म स्वीकार कराने का प्रयास करता रहा। उस प्रयास में पृथ्वीराज को शारीरक पीडाएँ दी गई। शरीरिक यातना देने के समय गौरी ने पृथ्वीराज को अन्धा कर दिया। अन्ध पृथ्वीराज ने अपने मित्र चंदरबरदई के साथ मिलकर गोरी का वध करने की योजना बनाई, योजना के तहत हिन्दू हृदय सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी विद्या से तीर छोड़कर मोहम्मद गोरी का वध कर दिया ।
इतिहास में वर्णन मिलता है कि, पुत्र के जन्म के पश्चात् पिता सोमेश्वर अपने पुत्र का भविष्यफल बताने के लिए राजपुरोहितों को निवेदन करते हैं। उसके पश्चात् बालक का भाग्यफल देख कर राजपुरोहितों ने "पृथ्वीराज" नामकरण किया। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में नामकरण का उल्लेख प्राप्त है -
पृथ्वी को पवित्र करने के लिए और "राज" शब्द को सार्थक बनाने के लिए इस राजकुमार का नामकरण "पृथ्वीराज" किया गया है। 'पृथ्वीराज रासो' काव्य में भी नामकरण का वर्णन करते हुए चन्द्रबदाई लिखते हैं –
पृथ्वीराज नामक बालक महाराजाओं के छत्र अपने बल से हर लेगा। सिंहासन की शोभा को बढाएगा अर्थात् कलियुग में पृथ्वी में सूर्य के समान देदीप्यमान होगा।
कुमारपाल के शासन में चालुक्यों के प्रासाद में जन्मा पृथ्वीराज बाल्यावस्था से ही वैभवपूर्ण वातावरण में बड़ा हुआ। वैभव सम्पन्न प्रासाद में पृथ्वीराज के चारों ओर परिचायिकाओं का बाहुल्य था। दुष्ट ग्रहों से बालक की रक्षा करने के लिए परिचायिकाएं भी विभिन्न मार्गों का अवलम्बन करती थीं। पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में महाकवि जयानक द्वारा ये वर्णन प्राप्त है।
दशावतार मुद्रित कण्ठ का आभूषण और दुष्टग्रहो से रक्षा के लिए व्याघ्रनख से निर्मित आभरण परिचायिकाओं ने बालक को पहनाया था।
बालक के कृष्ण केश और मधुकर वाणी मन को मोहित करते थे। सुन्दर ललाट पर किया गया तिलक बालक के सौन्दर्य में और वृद्धि कर रहा था। उज्जवल दन्त हीरक जैसे आभायुक्त थे। नेत्र में किया गया अञ्जन आकर्षण बढाता था। घुटनों द्वारा जब बालक यहाँ वहाँ घुमता था, तब उसके वस्त्र धूलिकामय होते थे। खेलते हुए पुत्र को देख कर माता कर्पूरदेवी अपने पुत्र का कपोल चुम्बति थी।
इस प्रकार अण्हिलपाटण के सहस्रलिङ्ग सरोवर और अलङ्कृत सोपानकूप के मध्य में स्थित राजप्रासाद के विशाल भूभाग में पृथ्वीराज का बाल्य काल व्यतीत हुआ।
चालुक्य वंश के प्रासाद से जब सोमेश्वर अजमेरु गए, तब उनके साथ उनकी पत्नी कर्पूरदेवी, दो पुत्र पृथ्वीराज और हरिराज थे। गुजरात राज्यसे जब सोमेश्वर अजमेरू प्रदेश में स्थानान्तरित हुए, तब पृथ्वीराज की आयु पांच वर्ष थी। पृथ्वीराज का अध्ययन अजयमेरु प्रासाद में और विग्रहराज द्वारा स्थापित सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ में प्रासाद और विद्यापीठ के प्राङ्गण में युद्धकला और शस्त्र विद्या का ज्ञान पृथ्वीराज ने प्राप्त किया। यद्यपि आदिकाल से ही शाकम्भरी के चौहान वंश स्रामाज्य की राजभाषा संस्कृतम् थी, तथापि अन्य भाषाओं में भी वाग्व्यवहार होता था। परन्तु संस्कृत आदिकाल से शाकम्भरी की राजभाषा थी ये प्राप्त शिलालेखों से ज्ञात होता है। विग्रहराज द्वारा और उनके राजकवि द्वारा रचित ग्रन्थों से भी अपने संस्कृत ज्ञान का प्रदर्शन किया है। विग्रहराज के राजकवि सोमदेव ने 'ललितविग्रहराजः' नामक नाटक की रचना की थी। उस नाटक में उन्होंने प्रचलित छः भाषाओं का कुशलता से उपयोग किया। शिला लेखों के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि, चौहान वं के काल में मुख्यतया छः भाषाएँ प्रचलित थीं। वे इस प्रकार हैं - संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश भाषा ।
पृथ्वीराज विजय में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज चौहान छओं भाषा में निपुण थे। छः भाषाओं के अतिरिक्त पृथ्वीराज ने मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान प्राप्त किया था। वह सङ्गीत कला और चित्र कला में भी प्रवीण थे। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, धनुर्विद्या में पारंगत पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण को चलाने में भी सक्षम थे। पृथ्वीराज अश्व नियन्त्रण विद्या और गज नियन्त्रण विद्या में विचक्षण थे। इस प्रकार विविध विद्याओं के अर्जन करते हुए पृथ्वीराज तरुणावस्था को प्राप्त हुए।
१४ मार्च ११७९ को वो शिलालेख प्रस्थापित हुआ था। सोमेश्वर के निधन के पश्चात् पृथ्वीराज का राज्याभिषेक हुआ।
शुभ मुहूर्त में पृथ्वीराज स्वर्ण सिंहासन पर आरूढ हुए। ब्राह्मणों ने वेदमन्त्र गान के साथ उनका राजतिलक किया। पृथ्वीराज के राज्याभिषेक के अवसर पर प्रासाद की शोभा आह्लादक थी। सभी सामन्तों द्वारा जय घोष हुआ और राजधानी में शोभा यात्रा हुई।
पृथ्वीराज की सेना में अश्व सेना का महत्त्व अधिक था। परन्तु हाथी सेना और पदाति सैनिकों की भी मुख्य भूमिका रहती थी। पृथ्वीराज जब राजा बने, तब आरम्भिक काल में उनकी सेना में 70 हज़ार अश्वारोही सैनिक थे। जैसे जैसे सैन्याभियान में पृथ्वीराज की विजय होती गई, वैसे वैसे सेना में भी वृद्धि होती गई।
पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के दशम सर्ग के उत्तरार्ध में उल्लेख मिलता है कि, पृथ्वीराज की अनेक रानीयाँ थी। परन्तु वे कितनी थी? कौन से प्रदेश की राजकुमारीयाँ थी? ये उल्लेख वहाँ नहीं है। पृथ्वीराज रासो काव्य में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज जब ग्यारह वर्षीय थे, तब उनका प्रप्रथम विवाह हुआ था। उसके पश्चात् प्रतिवर्ष उनका एक एक विवाह हुता गया, जब तक पृथ्वीराज बाईस वर्षीय (२२) न हुए। उसके पश्चात् पृथ्वीराज जब छत्तीस वर्षीय हुए, तह उनका अन्तिम विवाह संयोगिता के साथ हुआ।
पृथ्वीराज का प्रप्रथम विवाह मण्डोर प्रदेश की नाहड राव पडिहार की पुत्री जम्भावती के साथ हुआ था। पृथ्वीराज रासो काव्य के हस्तप्रत में केवल पांच रानीओ के नाम हैं। वे इस प्रकार है - जम्भावती, इच्छनी, यादवी शशिव्रता, हंसावती और संयोगिता। पृथ्वीजरासोकाव्य की लघु हस्तप्रत में केवल दो नाम हैं। वे इच्छनी और संयोगिता हैं। और सब से छोटी हस्तप्रत में केवल संयोगिता का ही नाम उपलब्ध है। एवं संयोगिता का नाम सभी हस्तप्रतों में उपलब्ध है।
पृथ्वीराज रासो काव्य में 'पद्मावतीसमयः' नामक आख्यान भी प्राप्य है। रासोकाव्य के अनुसार पूर्व दिशा में समुद्रशिख नामक प्रदेश था। वहाँ यादव वंशीय के विजयपाल नाम राजा का शासन था। उसकी पत्नी का नाम पद्मसेन था। उन दोनों की पुत्री पद्मावती थी। पद्मावती एक दिन राजभवन के उद्यान में विचरण कर रही थी। उस समय उसके द्वारा एक शुक को देखा गया। वह शुक अत्यन्त आकर्षक था। वह शुक भी पद्मावती के रक्त अधर को बिम्बाफल मान कर उसे खाने के लिए आगे बढा। उसी समय पद्मावती ने शुक को अपने हाथ में ग्रहण किया। वह शुक मानव भाषा का ज्ञाता था। वह पद्मावती का मनोरञ्जन करने के लिए अनेक कथा सुनाता रहा। उसके पश्चात् पद्मावती ने जिज्ञासावश शुक को पुछा कि, "हे शुकराज ! आप कहाँ निवास करते हैं? आपके राज्य का राजा कौन है?" तब पद्मावती की जिज्ञासा के उपशमन के लिए शुक ने विस्तार पूर्वक अपने राज्य और पृथ्वीराज का वर्णन आरंभ किया।
शुक के मुख से पृथ्वीराज की प्रशंसा सुन कर यादव कुमारी पद्मावती का मन पृथ्वीराज के प्रति अनुरक्त हो गया। परन्तु यौवन प्राप्त पद्मावती का विवाह विजयपाल ने कुमुदमणि के साथ निर्धारित कर दिया था। कुमुदमणि कुमाऊँ प्रदेश का राजा था। समुद्रशिखर प्रदेश में राजकुमारी का विवाह की सज्जता हो रही थी। दुसरी ओर अपने विवाह के समाचार सुनकर पद्मावती व्याकुल थी। उसके पश्चात् वह शुक को बोली, "हे कीर ! शुक ! आप शीघ्र ही दिल्ली जाकर मेरे प्रिय पृथ्वीराज को यहाँ बुला लाईए"। उसके पश्चात् पद्मावती ने शुक को एक पत्र दिया।
शुक ने वायुवेग से देहली जा कर पृथ्वीराज को पत्र दिया। पत्र पढ़कर पृथ्वीराज ने सामन्तों के साथ समुद्रशिखर नगर की ओर यात्रा प्रारम्भ की। दुसरी ओर कुमुदमणि ने कुमाऊँ से वरयात्रा प्रारम्भ की। पृथ्वीराज समुद्रशिखर जा रहा हैं ये समाचार प्राप्त करके मुहम्मद ग़ोरी ने भी समुद्रशिखर की ओर यात्रा आरंभ की। उसके पश्चात् समुद्रशिखर जा रहे कुमुदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पद्मावती अति व्याकुला हो गई। क्योंकि पृथ्वीराज के आगमन का समाचार उसे नहीं मिला था। अतः वह प्रासाद के वातायन पर बैठ कर मार्ग को विह्वल मन से देखती हुई प्रतीक्षा करते हुए रो रही थी। उसी समय शुक आकर उसे बोला, "हे सुन्दरि ! तेरे प्रियतम समीप के शिव मन्दिर में हैं। तुम शीघ्र ही वहाँ जोओं"। शुक का वचन सुन कर पुनर्जीवन प्राप्त पद्मावती के नेत्रे अचानक चमक उठ्ठे। नवीन वस्त्र धारण कर सुगन्धित जल से स्नान कर षोडश (सोलह) शृङ्गार करके अपनी सखिओं के साथ वह स्वर्ण स्थालिका (थाली) में दीप लेकर शिवालय गई। शिवालय पहुंच कर शिव पार्वती की पूजा करके पृथ्वीराज की ओर गई। उसके पश्चात् अपने मुखावरण को हटा कर वह मुग्ध हो कर पृथ्वीराज के सौन्दर्य को देखती रही। पृथ्वीराज भी थोड़ा आगे जाकर पद्मावती के समीप खडे हो गये। मन्दिर का वह दृश्य देख कर पद्मावती की सखियाँ साश्चर्य चकित होकर पद्मावती को और पृथ्वीराज को देख रही थी। क्योंकि पद्मावती और पृथ्वीराज के प्रणय के विषय में शुक (तोता) को छोड़ कर कोई भी नहीं जानता था।
उसके पश्चात् पृथ्वीराज ने पद्मावती का हाथ अपने हाथ में लेखकर अश्वारोहण किया। देहली की ओर पृथ्वीराज और पद्मावती की यात्रा का आरम्भ होते ही समुद्रशिखरनगर में सर्वत्र पद्मवातीहरण का समाचार व्याप्त हो गया। विजयपाल और कुमुदमणि पृथ्वीराज के साथ युद्ध करन के लिए पृथ्वीराज के पीछे गए। विजयपाल और कुमदमणि के आगमन का समाचार सुन कर पृथ्वीराज सामन्न्तों के साथ युद्ध के लिए सज्ज हो गए। उसके पश्चात् विनाशक युद्ध में विजयी पृथ्वीराज ने देहली की ओर यात्रा आरम्भ की। परन्तु मार्ग में मुहम्मद घोरी ने अपने सैनिकों के साथ पृथ्वीराज के ऊपर आक्रमण कर दिया। परन्तु घोरी की सेना की घोर पराजय हुई। उसके सभी सैनिक यहाँ वहाँ पलायन कर रहे थे और पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना कर देहली की ओर प्रयाण किया। देहली पहुंच कर दुर्गा के मन्दिर में शुभमुहूर्त में पृथ्वीराज ने पद्मावती के साथ विवाह कर लिया।
इतिहासविदों का मत है कि, साहित्यिक दृष्टि से उक्त कथा का महत्त्व है, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से उक्त कथा का महत्त्व नहीं है। क्योंकि इतिहास में कहीं पर समुद्रशिखर नामक दुर्ग का और उसके राजा विजयपाल का उल्लेख प्राप्य नहीं है। दोनों नाम काल्पनिक हैं। इतिहासविदों का मत है कि, ये कथा कोई पुराण कालीन प्रसिद्ध कथा होगी, जिसका अवलम्बन करके अज्ञात व्यक्ति ने पृथ्वीराज रासो काव्य में प्रक्षेप की होगी।
पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के दशम सर्ग के षष्ठम और सप्तम श्लोक में उल्लेख है कि, भाग्यशाली, बलशाली विग्रहराज का विवेकशून्य पुत्र नागार्जुन ने गुजपुर के ऊपर आक्रमण किया था। तोमरवंशीय राजा पृथ्वीपाल के पास उतनी सैन्यशक्ति नहीं थी, जिससे वह पृथ्वीराज पर आक्रमण कर सके। परन्तु पृथ्वीपाल का समर्थन अन्य यादववंशी भादानक नामक सामन्त ने भी किया। फिर भी उन दोनों की सम्मिलित सेना भी पृथ्वीराज के ७०,००० अश्वारोही सैनिकों का, गजसैनिका का और पदातिओं का सामना करने में असमर्थ थी। हरिहर निवास द्विवेदी का मत है कि, सपादलक्ष साम्राज का पूर्वीय प्रतिवेशी (पड़ोशी) राज्य जेजाकभुक्ति और कान्यकुब्ज राज्य ने भी पृथ्वीराज के विरुद्ध युद्ध करने के लिये पृथ्वीपाल को सैन्य सहायता प्रदान की थी।
शाकम्भरी के चौहान वंश का बयानप्रदेशीय यादववंशीयों को साथ प्रप्रथम बार युद्ध अजयराज के काल में हुआ थआ। बिजौलिया के शिलालेख में पन्द्रहवें श्लोक में उल्लेख प्राप्त होता है कि, श्रीमार्ग का और दुर्द्द प्रदेश के अभियान काल में चाचिग, सिङ्घुल, और यशोधर इत्यादि वीरों का वध अजयराज ने किया था। उसके पश्चात् अर्णोराज और विग्रहराज ने भी बयानप्रदेशीय यादववंशीयों के साथ किये थे। परन्तु वे सब यादवों को समूल नष्ट करने में सफल न हुए। पृथ्वीराज के विरुद्ध यदा नागार्जुन ने विद्रोह किया, तबभादानक प्रदेशीय राजा सोहणपाल चौहान वंश के विरुद्ध युद्ध करने के लिये सज्ज हुआ। अतः उसने अपने सैन्यबल से नागार्जुन की सहायता की। सोहणपाल के पूर्वज कुमारपाल के साथ विग्रहराज ने युद्ध किया था(ई. ११५०-११६४) [25]। आनुवंशिक युद्ध की स्थिति पृथ्वीराज के शासनकाल में अपि समुद्भूत हुई। परन्तु पृथ्वीराज ने भादानक प्रदेश के यादववंशीयों का समूल उच्छेदन कर दिया[26]।
भादानक प्रदेश के ऊपरि आक्रमण करने से प्राक् पृथ्वीराज ने अपनी शासन व्यवस्था में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये थे। प्रप्रथम तो हांसीपुर के सामन्त को पदच्युत करके अपने भाई हरिराज को हांसीदुर्ग के सामन्त के रूप में नियुक्त किया[27]। द्वितीय कार्य में उन्होंने योगिनीपुर में पृथ्वीपाल के रिक्तस्थान में गोविन्द को नियुक्त किया। एवं युद्ध के मुख्य दो केन्द्रों की पर्याप्त रक्षण व्यवस्था करके अपने विरोधियों के षडयंत्र का प्रत्युत्तर देने के लिये पृथ्वीराज सज्ज हो गए।
खरतरगच्छपट्टावली के १४ पृष्ठ पर सूचना प्राप्य है कि, पृथ्वीराज ने दिग्विजय अभियान के लिये नरायन प्रदेश में अपनी सेना का सङ्घटन किया। भुवन्नैकमल्ल स्वयं सैनिकों का और अधिकारियों का दिशानिर्देशन और सञ्चालन कर रहे थे। पृथ्वाराज ने सैन्य सज्जता के अनन्तर शत्रु प्रदेश के निरीक्षण के लिये भुवनैकमल्ल के नेतृत्व में एक दल को आगे भेजा। उसके पश्चात् अपने सेनापतियों के साथ स्वयं विशाल सैन्य को लेकर दिग्विजय अभियान आरम्भ किया। पृथ्वीराज के सेनापतियों में कैमास और स्कन्द प्रमुख थे।
मोहम्मद घोरी ई. 1175 वर्ष में मुल्तान प्रदेश पर आधिपत्य प्रस्थापित कर उसी वर्ष उच्छ प्रदेश पर छल से आधिपत्य स्थापित कर चुका था। उसके पश्चात् ई. ११८२ वर्ष में दक्षिण सिन्ध प्रदेश के ऊपर आक्रमण करके शनैः शनैः उसने सिन्धुप्रदेश पर स्वाधिपत्य स्थापित किया। उस से सपादलक्षसाम्राज्य की और घोरी द्वारा शासित सन्धुप्रदेश की सीमा समान हो गई। एवं घोरी पृथ्वीराज का प्रतिवेशी और शत्रु बन बैठा। उन दोनों के पास शत्रुता के अपने कारण भ थे। पृथ्वीराज अपने प्रदेश का सीमारक्षण करना चाहते थे, परन्तु उसके लिये तूर्क के आक्रान्ताओं को पीछे हटाना अनिवार्य था। दूसरी ओर घोरी की विस्तारवादि नीति के मार्ग में पृथ्वीराज कण्टक समान थे। क्योंकि भारत प्रदेश पर सत्ताविस्तार के लिये पृथ्वीराज का अन्त ही घोरी का लक्ष्य था।
पृथ्वीराजविजय में उल्लेख मिलता है कि, पश्चिमोत्तर दिशा में जो अश्वों के लिये प्रसिद्ध प्रदेश हैं, उस प्रदेश का गौमांसभक्षी म्लेच्छ घोरी नामक राजा गर्जन देश में निवास करता है। तूर्क देशीय उस गौमांसभक्षण करने वाले के विषय में सुन कर पृथ्वीराज ने म्लेच्छों के नाश की प्रतिज्ञा ली। पृथ्वीराज द्वारा म्लेच्छनाश की जो प्रतिज्ञा की गई थी, उसके विषय में घोरी भी जानता थआ। अतः उसने ई. 1177 वर्ष में अजयमेरु दुर्ग में अपना दूत भेजा। उसके पश्चात् अजयमेरु की राज्यसभा में टकला दूत उपस्थित हुआ। यदा वो दूत अजमेरुप्रासाद में उपस्थित था, तबप्रासाद में नागार्जुनदमन का उत्सव चल रहा था। विधाता द्वारा कपिलावध की प्रशस्ति लिखने के लिये ही उसके ललाट की रचना की है इत्यादि वाक्यों से उस दूत के सपाट टकले का उपहास पृथ्वीराज विजय महाकाव्य में प्राप्त होता है।
पृथ्वीराज के सपादलक्षसाम्राज्य की सीमा का और सिन्धुप्रदेश की सीमा के परिवर्तित राजनैतिक समीकरण के साथ साथ वीकमपुर का भी राजनैतिक महत्त्व बढ गया था। क्योंकि वीकमपुर की सीम के साथ ही सिन्धु और सपादलक्ष प्रदेशों की सीमा सम्मिलत होती थी। इस प्रकार वीकमप्रदेश का पश्चीमभाग सिन्धुप्रदेश की और पूर्वभाग सपादलक्षप्रदेश की सीमा को स्पर्श करने लगा। उस समय वीकमपुर में लोद्रवावंश का शासन था। उक्त राजनैतिक समीकरण में राष्ट्रहित की बलि देकर लोद्रवा वंशीय राजा जैसल ने राजा घोरी की सहायता की। क्योंकि घोरी के समर्थन से ही लोद्रवावंश को शासन प्रप्त हुआ था।
घोरी के साथ पृथ्वीराज के कितने युद्ध हुए, इस विषय पर विवाद है। क्योंकि विभिन्न ऐतिहासिक साहित्य में विभिन्न युद्धसङ्ख्याएं प्रदत्त हैं। परन्तु सर्वत्र उन दोनों के भीषण युद्ध का वर्णन उपलब्ध होता है। नरायन का प्रथम युद्ध और नरायन का द्वितीय युद्धम् तो प्रसिद्ध ही हैं। प्रथम युद्ध ई 1191 वर्ष में और द्वितीय युद्ध ई. 1192 वर्ष में हुआ था। प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई और द्वितीय में पृथ्वीराज की पराजय।
प्रबन्धकोश में वर्णित है कि, पृथ्वीराज ने बीस बार घोरी को बन्दी कर छोड़ दिया था। सुर्जनचरितमहाकाव्य के अनुसार इक्कीस बार पृथ्वीराज ने घोरी को दण्ड दिया था। प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थ के अनुसार तेईस बार पृथ्वीराज ने घोरी को जीवित छोड़ दिया।
घोरी के साथ पृथ्वीराज के जितने युद्ध हुए, उनके प्रमाण अनुपलब्ध हैं। अतः निश्चित सङ्ख्या के विषय में विवाद यथावत् है। परन्तु इतिहासविदों का मत है कि, पृथ्वीराज और घोरी को मध्य अनेक बार घर्षण हुए थे। कहीं लघु घर्षण कुत्रचित् बड़े। सभी घर्षण में पृथ्वीराज की ही विजय हुई थी। अतः सङ्ख्या तो अस्पष्ट है, परन्तु पृथ्वीराज की विजय की निश्चितता सर्वत्र दिखाई गई है। अन्तिम युद्ध में अर्थात् नरायन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई थी।
सतलज का युद्ध पृथ्वीराज का घोरी के साथ प्रप्रथम युद्ध था। उस युद्ध में घोरी की घोरपराजय हुई थी। उस युद्ध में घोरी के पराजय के अनन्तर ही परमारवंशीय सूर नामक सामन्त प्रतिवर्ष गझनी (गज़नी) प्रदेश कर लेने जाता था। सतलजयुद्ध का विवरण बहुत्र प्राप्त नहीं होता, अतः पृथ्वीराज के घोरी के साथ दो युद्ध ही हुए ये भ्रमणा है।
मुल्तान प्रदेश से भारत पहुचे घोरी ने उच्छ प्रदेश पर आक्रमण करना चाहा। परन्तु उच्छप्रदेश के राजपूतों से वह भयभीत हो गया। राजपूतों के सम्मुख घोरी की विजय असम्भव सी थी। अतः उसने कपट से उच्छप्रदेश पर आधिपत्य की योजना बनाई। घोरी को गुप्तचरो से ज्ञात हुआ कि, उच्छ प्रदेश के राजा के सम्बन्ध अपनी राज्ञी से सरल नहीं अर्थात् उनके सम्बन्ध में कटुता है। अतः घोरी ने राज्ञी को सन्देश भेजा। उस सन्देश में उसने लिखा कि, "यदि आप अपने पति को विष देकर मार डालें, तर्हि मैं आपके साथ विवाह करूंगा"। घोरी के सन्देश के प्रत्युत्तर में राज्ञी ने लिखा, "मैं तो प्रौढ (अधेड़, middle aged) हो चली हूँ। मैं विवाह करके क्या करूंगी? परन्तु मेरी पुत्री के साथ आप विवाह करे तो, मैं आपका ईप्सित कार्य कर सकती हूँ।
राज्ञी के प्रत्युत्तर पाकर घोरी ने अनुक्षण अपना सम्मति पत्र भेजा। क्योंकि उसका उद्देश उच्छ प्रदेश पर आधिपत्य स्थापन करना था। विवाहादि का विषय तो उसके कपट का केवल भाग था। तत्पश्चात् उच्छप्रदेश की राज्ञी ने अपने पति को विष देकर मार दिया। दुर्ग, कोषागार और शस्त्रागार को ताला मारकर उसकी चाबी घोरी को भिजवा दी। इस प्रकार छल से और कपट से घोरी उच्छ प्रदेश का अधिपति बन बैठा। घोरी यदा उच्छ प्रदेश का अधिपति हुआ, तबउसने उच्छप्रदेश की राज्ञी और राजकुमारी को गझनी प्रदेश भेज दिया। यदा राजकुमारी को अपनी माता का कृत्य पता चला, तबउसने माता का तिरस्कार कर दिया। अपने आचरण के प्रति दोषभाव और पुत्री की घृणा के कारण राज्ञी ने अपने प्राण त्याग दिये। उसके पश्चात् कुछ दिन संसार के दुःख सह कर राजकुमारी ने भी देह त्याग दिया। डॉ॰ हबीबुल्लाह का मत है कि, उच्छप्रदेश में भट्टीराजाओँ के शासन का प्रमाण नहीं है। अतः इब्न असीर, यहिया सरहिन्दी, निजामुद्दीन अहमद, फरिस्ता इत्यादि के रचिता ने इस घटना को काल्पिनिक कहा है। परन्तु घोरी ने उच्छप्रदेश पर कपट से आधिपत्य जमाया इस विषय पर सभी इतिहासविद् सम्मत हैं।
उच्छप्रदेश के ऊपर स्वाधिपत्य प्राप्त कर घोरी ने मार्ग में किराडू नामक स्थल पर स्थित सोमेश्वरमहादेव के मन्दिर को लुट लिया। शिव के वो मन्दिर उस समय राजस्थानराज्य में प्रसिद्ध था। सुन्दररत्नों से अलङ्कृत भव्य उस मन्दिर को लुट कर उस मन्दिर का पूर्णतया नाश करके घोरी गुजरात राज्य की ओर आगे बढा। व साण्डेराव प्रदेश से होते हुए नाडोलिया के चौहान वंशीयों की नाडोल नामक राजधानी पर ऊपर आक्रमण किया। उस समय नाडोल प्रदेश पर चालुक्यवंशयो के सामन्त क्लहणवंश के राजा शासन कर रहे थे। राजस्थान में स्थित उस नाडोल नगर में तूर्क-सैनिको द्वारा मन्दिरों को अग्निसात् किया गया और नागरिकों को लुट लिया गया। घोरी द्वारा नाडोल नगर का जो अधःपतन हुआ, उसके समाचार पृथ्वीराज को मिले। उसके पश्चात् क्रोध से उन्होंने घोरी (ग़ोरी) के दर्पभङ्ग की प्रतिज्ञा की। वह अपने सैनिको के साथ शस्त्र लेकर सज्ज हो गए।
युवा पृथ्वीराज का मत था कि, "चालुक्य और चौहान वंश की समस्या गृहसमस्या है। बाहर से आया कोई म्लेच्छ भारतदेश के ऊपर आक्रमण करके भारत की अस्मिता की हत्या नहीं कर सकता। अतः हमें गुजरात राज्यको सैन्य सहायता देनी चाहिये"। परन्तु युवा पृथ्वीराज के क्रोध को शान्त करते हुए सपादलक्ष साम्राज्य के मण्डलेश्वर कैमास ने अपनी कूटनैतिकव्याख्या को प्रस्तुत किया। पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध कहाँ हुआ था? इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। मिन्हाज सिराज ने युद्धक्षेत्र का नाम नरायन [64][65] बताया है। तारीखे फरीश्ता ग्रन्थ में युद्धक्षेत्र का नाम तरायन लिखा है। अन्यत्र उसका कथन है कि, तराइन उत तरायन अभी तरावडी नाम से प्रसिद्ध है[66]। डॉ॰ खलिक अहमद निजामी और डॉ॰ हबीबुल्लाह इन दोनो ने फरिश्ता-ग्रन्थ का समर्थन किया है। क्योंकि उन दोनों के मत हैं कि, मुद्रक के दोष से तरायन के स्थान पर नरायन हो गया। डॉ॰ हबीबुल्लाह जिस 'तरायन' क्षेत्र का समर्थन करते हैं, वह थानेश्वर से दक्षिणदिशा में १४ मील दूर है। परन्तु उस के मतानुसार तोरावाना नामक स्थल तरायन युद्ध क्षेत्र था। वो तोरावाना क्षेत्र राजस्थानराज्य के सिरसामण्डल के कलांवत नामक उपमण्डल के समीपस्थ स्थल है।
दोनों सेनाएं एक दूसरे की ओर दोडने लगी। सर्वप्रथम पृथ्वीराज के पृष्ठभाग की अश्वारोहिणी सेना ने घोरी की वामभाग और दक्षिणभाग की सेना पर आक्रमण कर दिया। घोरी (ग़ोरी) के सैनिक उस घातक आक्रमण को सहने में शक्त नहीं थे। अतः प्राणों की रक्षा के लिये सेना के मध्यभाग की ओर पलायन करकने लगे। इस प्रकार तूर्कसेना का व्यूह ध्वस्त हो गया। घोरी के सभी विभाग मिश्रित हो चुके थे। उस व्यूह के ध्वस्त होने से अनेक यवनसैनिक मारे गये। राजपूतों के आक्रमण से तूर्कसेना के दिग्गज सैनिक भी रणक्षेत्र को त्याग कर पलायन कर गये। युद्ध के आरम्भ पश्चात् घोरी देहलीप्रदेश के सामन्त गोविन्द की ओर गया। घोरी को अपनी ओर आते देख गोविन्द भी उसके साथ योद्ध करने के लिये आगे गये। तत्पश्चात् उन दोनों में युद्ध हुआ। घोरी ने गोविन्द के ऊपर अपने शूल से प्रहार किया। वह शूल गोविन्द के मुख में प्रविष्ट हो गया। शूलप्रहार से गोविन्द के दांत भी गिर गये। शूल गोविन्द के मुख से प्रविष्ट हो कर कण्ठ तक अन्तर चला गया। उसके पश्चात् गोविन्द ने भी प्रतिप्रहार किया। गोविन्द ने अपने शूल के प्रहार से घोरी की भुजा पर आघात किया। वो आघात अति शक्तिशाली था। भयभीत घोरी अपने अश्व की दिशा को परिवर्तित कर युद्धक्षेत्र से भाग गया। परन्तु आहत घोरी भूमि पर गिर गया। राजपूत सैनिको द्वारा घोरी को बन्दी बना लिया गया। इस प्रकार पृथ्वीराज ने तूर्क सैनिको पर पूर्णतः आधिपत्य स्थापित कर लिया।
मिन्हाज के पुस्तक में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना लिया। उसके पश्चात् घोरी द्वारा क्षमा याचना करने पर पृथ्वीराज ने तूर्क के सैनिको के साथ घोरी को मुक्त कर दिया। पृथ्वीराज की विजय के अनन्तर घोरी की सेना पर कोई भी हत्याचार नहीं किया गया था। पृथ्वीराज ने सभी सैनिको को सकुशल तूर्क की ओर भेज दिया था। पृथ्वीराज की इस उदारता का भारतीय राष्ट्रवादी इतिहासकारो देवारा कटू आलोचना की गई है। इतिहासविदों के मतानुसार नरायन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय का मुख्यतम कारण घोरी की मुक्ति थी [प्रथम नरायनयुद्ध में घोरी की पराजय के अनन्तर पृथ्वीराज के आदेश से मुक्त किया गया घोरी लाहोर गया। वहाँ उसके सैनिक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। लाहोर प्रदेश में घोरी दो मास तक रुका। क्योंकि युद्ध में आहत घोरी की शारीरक वृण के लिये ओषधि आवश्यक थी। दो मास घोरी द्वारा लाहोर दुर्ग का नवनिर्माण भी करवाया गया। तत्पश्चात् वह अपनी सेना के साथ गझनी प्रदेश चला गया। इसामी के कथनानुसार गझनी प्रदेश पहुचकर घोरी ने गझनवी-वंश के खुशरो मलिक नामक राजा और उसके पुत्र को मृत्युदण्ड दिया।
घोरी ने गझनी (गज़नी) प्रदेश पहुच कर नरायन के प्रथम युद्ध में जो सैनिक रणक्षेत्र से पलायन कर गये थे, उनको भी दण्ड दिया। 'फरिश्ता' नामक पुस्तक में उल्लेख है कि, घोरी जब गझनी प्रदेश पहुचा, तब उसने अफगानप्रदेशीय सैनिको को तो पीडा नहीं दी, परन्तु घोरी-वंशीय, खुरासानी-वंशीय और खल्जी-वंशीय सैनिको का अपमान करके उनको दण्ड दिया। घोरी ने उन सैनिकों के मुख में अपक्व यव (जव) से भरे स्यूत (थैले - feedbag) बंधवाकर नगर उनको घुमाया। घोरी का आदेश था कि, जो सैनिक स्यूत से अपक्व यवों को न खाएँ, उनके शिर शरीर से पृथक् किये जायें]।
नरायन युद्ध के अनन्तर घोरी की मनःस्थिति अवसाद, क्लेश और आत्मग्लानि से युक्त थी। तबकाते नासिरी और तारिखे फरिश्ता इत्यादि ग्रन्थों में उल्लेख है कि, घोरी इतना दुःखी हो गया था कि, उसने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया था। दिन और रात्रि वह अपने पराजय के दुःख की अग्नि में जलता रहता था। वह अपनी पत्नी के पास भी शयन नहीं करता था। तत्पश्चात् उसकी माता की प्रेरणा से घोरी पुनः युद्ध के लिये सज्ज हो गया।
एक बार घोरी ऐबक् के साथ बैठ कर नरायनयुद्ध में हुए पराजय की समीक्षा कर रहा था। तब घोरी को ऐबक ने कहा, हमारे अश्व उत्तम हैं, परन्तु भारतीय हाथीओँ के मुख देखकर वे भयभीत हो जाते थे। क्योंकि पहले कभी भी उनका भारतीय हाथीओं के साथ युद्ध का अनुभव नहीं था। अतः भारतीय हथीओं के समीप वे भयभीत थे। यही मुख्य कारण है, जिस से हम भारतीय सेना के सम्मुख पराजित हुए।
अपने पराजय के कारण को को जानकर घोरी ने अग्रिम युद्ध के पूर्व अश्व प्रशिक्षण कैसे करना चाहिये? इसका भी उपाय ऐबक् को कहा। वह बोला, गिली मिट्टी से और काष्ठ से हथीओँ का निर्माण कराओ। उन हथीओँ को वैसे ही सजाओ, जैसे भारतीय हाथी सजे होते हैं। तत्पश्चात् उन हाथीओँ के चारो ओर अश्वारोही द्वारा युद्ध की स्थिति का निर्माण करवा कर अश्वों को निर्भय बनाओ। इस प्रकार युद्ध समय में भारतीय हाथीओं के सम्मुख उपस्थित हो ते हुए भी अश्व निर्भीक हो कर उनका प्रतीकार करने में सक्षम हो जाएँगे। घोरी के परामर्श के अनुसार ऐबक् ने अश्व प्रशिक्षण करवाया। वह स्वयं भी युद्ध सम्बद्ध नीतिओं को रचने लगा। उसने सचल-सैनिक-दल की रचना कर ली। उस सचल दल का मुख्य कार्य था कि, युद्ध के समय यदि किसी व्यूह के सैनिक दुर्बल हो जाएँ, तर्हि यह दल युद्ध क्षेत्र में एक दल से अपर दल में जाकर युद्ध कर सके। इस प्रकार युद्ध क्षेत्र में यदि किसी दल का सामर्थ्य दुर्बल हो जाता है, तर्हि ये दल उस अपर दल की सहायता करके युद्ध क्षेत्र में अपने बल को सन्तुलित कर सकता है। अश्व पर आरूढ हुए सैनिक बाण चलाने में भी सक्षम होने चाहिये, अतः ऐबक् द्वारा अपने सैनिकों को प्रशिण दिया गया था। ऐबक् की रणनीति का वर्णन फारसी-भाषा के ऐतिहासिक साहित्य में तो प्राप्त नहीं होता, परन्तु प्रसिद्ध युद्ध विज्ञानी आर् ए स्मैल के पुस्तक में उल्लेख मिलता है।
इसामी द्वारा लिखित फुतूहुस्सलातीन नामक पुस्तक में एक कवच का भी वर्णन प्राप्त होता है। उस कवच का नाम 'करवा' (जिहर्) था। वह कवच बैलों के चर्म से निर्मित किया गया था। उस कवच के दोनों ओर कपास या ऊन स्थापित किया जाता था। भारतीय सेना यदा तूर्क की सेना के पदाति पर प्रहार करें, तब वे तूर्क सैनिक आहत न हो जाये ये उस कवच निर्माण का उद्देश्य था। इस प्रकार घोरी ने ऐबक के साथ मिलकर प्रहारात्मक नीत और रक्षात्मक नीति की रचना कर ली।
घोरी ने लाहोर के दुर्ग में रहकर पृथ्वीराज के विरुद्ध षडयन्त्र भी आरम्भ कर दिया। एक ओर वह अपने सैन्य व्यवस्थापन, सैन्य प्रशिक्षण और गुप्तचर भेजने के कार्य में व्यस्त था, दूसरी ओर उसने अपने दूत को अजयमेरु दुर्ग भेजा। यद्यपि वह जानता था कि, पृथ्वीराज उसके पत्र का क्या प्रत्युत्तर देंगे, तथापि उसने अजयमेरु के दुर्ग में दूत को भेजा। क्योंकि वह केवल समय व्यतीत करना चाहता था। उसके पीछे उसका उद्देश था कि, उसकी सेना युद्ध के लिये सज्ज हो और सहयोगी निष्ठा का पुनः परीक्षण हो सके।
घोरी का दूत पृथ्वीराज के सम्मुख उपस्थित हुआ। घोरी द्वारा प्रदत्त पत्र उसने पढा। उस पत्र में उल्लिखित था कि, पृथ्वीराज ! अपने कानों में पराधीनता का आभूषण पहन कर मेरे प्रासाद उपस्थित हो कर तुम इस्लाम-धर्म का अङ्गीकार करो। अन्य फारसी लेखकों ने भी उक्त कथन का समर्थन किया है। फरिश्ता में मिलिता है कि, घोरी अपनी सेना के साथ लाहोर प्रदेश पहुंचा, तब कवामुल्मुल्क रुकुनुद्दीन हम्जा ने अजयमेरु दुर्ग को अपना सन्देश देने के लिये भेजा था। उस में "राजा इस्लाम्-धर्म का अङ्गीकारा करें" ये सन्देश लिखा हुआ था। फरिश्ता नामक ग्रन्थ में उल्लिखित है कि, पृथ्वीराज ने यदा दूत के मुख से सन्देश सुना, तबउन्होंने इस्लाम-धर्म के लिये अभद्र भाषा का उपयोग किया। पृथ्वीराज ने इस्माल-धर्म के अनुयायी राजाओं को भी अपशब्द कहे थे। फिर कवामुल्मुल्क को वापस भेज दिया था।
नरायन के युद्धक्षेत्र में घोरी को "किसी भी प्रकारण विजय प्राप्त करने के लिये सज्ज था"। दूसरी ओर पृथ्वीराज की सैन्यसज्जता ही नहीं थी। घोरी जानता था कि, पृथ्वीराज का सैन्यसामर्थ्य कितना है और पृथ्वीराज की युद्ध के लिये सज्जता नहीं है। पृथ्वीराज की युद्ध सम्बद्ध असज्जता के विषय में हम्मीरमहाकाव्ये विवरण प्राप्त होता है। हम्मीरमहाकाव्य में उल्लिखित किया गया है कि पृथ्वीराज के सेनापति उदयराज अपनी सेना के युद्ध क्षेत्र में विलम्ब से पहुंचे। पृथ्वीराज के प्रधान तो नरायन युद्ध में भाग भी नहीं ले सका। क्योंकि वह अन्य युद्ध में रत था। विरुद्धविधिविध्वंश नामक ग्रन्थ के 17 श्लोक में भी एसे वर्णन प्राप्त होते हैं। पृथ्वीराज के लिये युद्ध में विलम्ब हो ये अत्यावश्यक था, परन्तु घोरी पृथ्वीराज की दुर्बलता का लाभ लेकर युद्ध करने को तत्पर हो गया।
युद्ध
घोरी और उसके अधिकारी युद्धयोजना के विषय में बहुत कुछ परिकल्पना (design) करके युद्ध के लिये सज्ज थे। वे कब ?, कहाँ ? और कैसे ? पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण करेंगे इसका सब चिन्तन उनके द्वारा हो चुका था नरायनक्षेत्र में घोरी के पास जो सेना थी, वह चार विभागों में विभक्त थी। उस सेना के सैनिक भार विहीन शस्त्रों और भारसहित अश्वों से सज्ज थए। चोराों विभागों में विभक्त वह सेना चारों दिशाओ में भारतीय सेना के ऊपर आक्रमण करने के लिये सज्ज थी। जो सेना चारों विभाग में विभक्त थी, उनके अतिरिक्त 10000 सैनिकों के एक दल की रचना घोरी ने की थी। वें 10,000 सैनिक अश्व पर आरूढ होते हुए भी बाण चलाने में समर्थ थे। घोरी द्वारा उनको आदेश दिया गया था कि, वें सर्वदा शत्रुओं के साथ वाम, दक्षिण, अग्र और पृष्ठ भाग से युद्ध करें। आगे घोरी द्वारा आदेश दिया गया था कि, यदा भारतीय सेना के अश्वारोही, पदाति और हाथी आक्रमण के लिये आगे आयें, तबवें (तुर्कसैनिक) पीछे जाकर अपने और शत्रुं के मध्य एक अश्व दौड़ सके उतना अन्तर रक्खें। घोरी की ये नीति भारती सैनिकों में भ्रम उत्पादित करने के लिये थी। उक्त नीति से यदि तुर्कसैनिक युद्धक्षेत्र में आचरण करते हैं, तर्हि भारतीय सैनिकों में भ्रम होता है कि, तुर्कसेना ते सभी सैनिक युद्धक्षेत्र में हैं।
घोरी की रणनीति की विभिन्न परियोजना विभिन्न पुस्तकों में प्राप्त होती है। यथा यहिया सरहिन्दी नामक पुस्तक में उल्लेख है कि, यदा हिन्दूओं के हाथी और अश्व आरोहिणः तुर्कसेना के किसी दलस्य के ऊपर आक्रमण करते, तर्हि अन्य दल तीनों दिशा से आक्रमण करते थे। इसामी के पुस्तक में भी उल्लिखित है कि, नरायन के प्रथमयुद्ध के अनन्तर घोरी का चिन्तन था कि, भारतीय हस्तीओं की उपस्थिति में तुर्कदेशीय अश्व भयभीत थे, अतः द्वितीय युद्ध में हमें मुख्यतया हाथी पर ही प्रहार करने हैं। इसके लिये घोरी द्वारा ऐबक् के साथ मिलकर गझनी प्रदेश में अश्व भी प्रशिक्षित किये गये थे।
उक्त सैन्य योजना के साथ घोरी ने सम्पूर्ण रात्रि सैन्य सज्जता में व्यतीत की। दूसरी ओर पृथ्वीराज की सेना सम्पूर्ण रात्रि गहन निद्रा के अधीन थी। ब्राह्ममुहूर्त में घोरी की सेना पृथ्वीराज की शिविर पर चारों ओर से आक्रमण करने के लिये सज्ज थी। जिस समय पृथ्वीराज के सैनिक निद्राधीन थे, उसी समय घोरी ने आक्रमण कर दिया। युद्ध के आरम्भ में स्वय पृथ्वीराज भी निद्रा में निमग्न थे। कुछ सैनिक दैनिक कार्यों में व्यस्त थे।
'ताजुल मासिर' ग्रन्थ का लेखक हसन निजामी था। वह अपने ग्रन्थ में उल्लिखित करता है कि, खोखरों (पृथ्वीराज) का दमन करके घोरी वर्षों भारत में रहकर गझनी (गज़नी) प्रदेश वापस जा रहा था। जब वह धमेक प्रदेश के समीप पहुंचा, तब वहाँ कुमुद और चमेली जैसे पुष्पों से सुगन्धित उद्यान में शिबिर बनाई। जब घोरी सन्ध्याकालीन ('नमाज') प्रार्थना में रत था, तब कुछ लोग वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने रक्षकों और कर्मकरों को मारकर घोरी की हत्या करदी।
'तारिखे जहांकुश' ग्रन्थ का लेखक अलाउद्दीन जुवैनी था। इस ग्रन्थ का रचनाकाल हि.स. (यवनसंवत्सर) ६५५ (ई. १२५७) माना जाता है। मिन्हाज के 'तबकाते नासिरी' ग्रन्थ से तीन वर्ष पूर्व ही अलाउद्दीन जुवैनी के 'तारीखे जहांकुश' ग्रन्थ की रचना हुई थी। घोरी की मृत्य का वर्णन करते हुए अलाउद्दीन जुवैनी ने लिखा है कि, "हि.स. ६०२ (ई. १२०६) में खुरासान-प्रान्त का विध्वंस करके धन पाकर घोरी ने भारत के ऊपर अनेकबार आक्रमण किया। वह अनेक युद्धों में विजयी होकर अपने सैन्य को धनसम्पन्न करते जा रहा था। झेमल प्रदेश को लाङ्घकर जब वह गझनी प्रदेश की और मार्ग में था, तब उसने 'जिहू'-नदी (सन्धुनदी) के तट पर शिबिर लगाई। उस शिबिर में जब घोरी मध्याह्न काल में निद्राधीन था, तब कुछ हिन्दूओं ने नदी को लाङ्घकर शिबिर पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने शिबिर में उत्पात करके घोरी की हत्या कर दी।
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